अमलेंदु भूषण खां
नीट पेपर लीक विवाद को लेकर जेन जी का राष्ट्रीय राजधानी समेत पूरे देश में धरना और प्रदर्शन के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की आग में घी डालने का काम देश के तीन विधानसभा उपचुनाव परिणाम ने किया है। विधानसभा उपचुनाव परिणाम ने ना सिर्फ केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है बल्कि भारतीय जनता पार्टी के नव नियुक्त अध्यक्ष के नेतृत्व पर भी सवालिया निशान लगाया है। इतना ही नहीं साल के अंत में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की चुनौतियों का भी आकलन अब आसानी से किया जा सकता है। ये तीनों विधानसभा क्षेत्र सत्ताधारी भाजपा के राज्यों से आते हैं। इसलिए मोदी सरकार को अपने कामकाज में पारदर्शिता लाने का भी सबक दे रहा है।
आंदोलन से पहले भाजपा के नेता कहते रहे हैं कि इस सरकार में मंत्रियों के इस्तीफे नहीं हुआ करते। युवाओं के इस आंदोलन ने किसान आंदोलन की याद ताजा कर दी, जब सरकार को किसानों के एक साल चले आंदोलन के बाद तीन कृषि कानून वापस लेने पड़े थे। वहीं सरकार को उस संकट को स्वीकार करना पड़ा, जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था में दशकों से शिकंजा कसे हुआ था। बहरहाल, सड़कों पर उतरे छात्रों के आंदोलन से साफ संदेश सामने आया कि अब भारत के युवा उस सिस्टम से जवाबदेही मांग कर रहे हैं, जो उनके भविष्य का निर्धारण करता है।
बिहार में बांकीपुर तो मध्य प्रदेश में दतिया और गुजरात के मांजलपुर में विधानसभा उपचुनाव हुए हैं। बांकीपुर से भाजपा के अध्यक्ष नितिन नवीन विधायक थे जिनका न सिर्फ पार्टी स्तर पर कद बढ़ाया गया बल्कि देश स्तर पर। नवीन अब राज्यसभा सदस्य हो गए हैं। मध्य प्रदेश के दतिया से कांग्रेस उम्मीदवार जीत हासिल करने में कामयाब रहे। गुजरात के मांगलपुर पर भाजपा का कब्जा बरकरार रहा।
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार का असर सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं रहेगा। यह चुनाव इसलिए असाधारण माना जा रहा है क्योंकि यह भाजपा के पारंपरिक गढ़ में हो रहा है और दूसरी तरफ जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर पहली बार चुनावी मैदान में हैं। बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। ऐसे में हार को पार्टी के लिए प्रतिष्ठा की क्षति माना जाएगा। बांकीपुर कई चुनावों तक नितिन नवीन की सीट रही है। उनके राज्यसभा जाने के बाद यह उपचुनाव हुआ। इसलिए यह उठता है कि कि क्या पार्टी उनके बनाए संगठनात्मक ढांचे और वोट बैंक को बनाए रख सकी। राज्य की सम्राट चौधरी सरकार आम जनता की भावनाओं का कद्र कर रही है या सिर्फ हवा हवाई बातों में लोगों को उलझाए रखना चाहती है। साथ ही भाजपा संगठन की चुनावी रणनीति और स्थानीय नेतृत्व की क्षमता पर सवाल लाजमी है। पार्टी को यह देखना होगा कि क्या स्थानीय संगठन, बूथ प्रबंधन या उम्मीदवार चयन में कमी रही।
इस उपचुनाव में उम्मीदवार बदलने और चयन को लेकर पहले भी राजनीतिक चर्चा हुई थी। विपक्ष ने इसको लेकर भाजपा पर सवाल उठाए थे, जबकि भाजपा ने अंततः नया उम्मीदवार उतारा। हार की स्थिति में यह मुद्दा पार्टी के भीतर और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।
सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी का यह पहला बड़ा राजनीतिक टेस्ट माना जा सकता है। भाजपा अपना सबसे सुरक्षित शहरी क्षेत्र नहीं बचा पाई, तो विपक्ष का यह सवाल उठाना लाजमी है कि राज्य नेतृत्व का संगठनात्मक नियंत्रण कमजोर हुआ है। वहीं पार्टी के भीतर आम तौर पर ऐसी स्थिति में बूथ प्रबंधन, उम्मीदवार चयन और स्थानीय रणनीति की समीक्षा करने की जरुरत है।
विधानसभा उपचुनावों में हार मिली है, तो उसका राजनीतिक संदेश ज़रूर जाता है। उपचुनावों में स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, संगठन की मजबूती और स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों से अधिक प्रभाव डाल सकते हैं। हालांकि केवल उपचुनाव के नतीजों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी वही परिणाम दोहराए जाएंगे। उपचुनावों में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, मतदान प्रतिशत और सत्ता-विरोधी भावना अक्सर अधिक प्रभाव डालते हैं। लेकिन सत्ताधारी दल के लिए यह संदेश जरुर देता है। “Gen Z आंदोलन” का सवाल है, हाल के महीनों में युवाओं के बीच रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, शिक्षा और डिजिटल अभियानों जैसे मुद्दों पर सक्रियता बढ़ी है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह असंतोष चुनाव तक संगठित और व्यापक बना रहता है, तो यह खासकर पहली बार मतदान करने वाले और युवा मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।
जेन जी आंदोलन से एक और बात स्पष्ट रूप से सामने आई है कि युवाओं के इस आंदोलन ने देश के समक्ष मौजूदा दो सबसे बड़ी चुनौतियों- शिक्षा और बेरोजगारी को फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। ऐसा नहीं है कि इन मुद्दों पर चर्चा पहले नहीं हुई। लेकिन यह महज नीतियां बनाने और चुनावी भाषणों में चर्चा तक सीमित रह गया था। विडंबना यह है कि देश में एक के बाद एक आई सरकारों ने कभी इस चुनौती का सीधे तौर पर मुकाबला नहीं किया।
उत्तर प्रदेश में भी शिक्षकों की भर्ती का मामला लंबे समय से लंबित है। बेरोजगार युवा कई बार आंदोलन कर चुके हैं। लेकिन सरकार अभीतक भर्ती नहीं कर सकी है। भारतीय जनता पार्टी की बेचैनी को इस प्रकार भी देखा जा सकता है कि आने वाले चुनाव के लिए विधायकों की छवि को लेकर चार पांच सर्वे पार्टी और सरकार करा चुकी है। सर्वे से जो चौंकाने वाली बात सामने आ रही है वह उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय है।













