अमलेंदु भूषण खां
नई दिल्ली। राजस्थान की राजनीति के दो प्रमुख चेहरे भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश पूनिया और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सचिन पायलट अब पंजाब की चुनावी जमीन पर आमने-सामने की राजनीतिक चुनौती में दिखाई दे रहे हैं। वर्ष 2027 में होने वाला पंजाब विधानसभा चुनाव दोनों नेताओं के लिए सिर्फ दूसरे राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि उनकी संगठनात्मक क्षमता, राजनीतिक प्रभाव और भविष्य की भूमिका की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।
पंजाब विधानसभा का कार्यकाल मार्च 2027 में समाप्त होना है और राज्य में 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव होना है। निर्वाचन आयोग ने अभी चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं किया है।
पूनिया को पंजाब की कमान, 117 सीटों पर भाजपा अकेले मैदान में
भाजपा ने पंजाब में संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी सतीश पूनिया को दी है। पूनिया ने हाल ही में स्पष्ट किया कि भाजपा पंजाब की सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और किसी गठबंधन पर निर्भर नहीं रहेगी। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन को लेकर अटकलें चल रही थीं।
पूनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती पंजाब में भाजपा को पारंपरिक गठबंधन की राजनीति से बाहर निकालकर स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ा करना है। यदि भाजपा अपने प्रदर्शन में बड़ा सुधार करती है तो पूनिया की राष्ट्रीय संगठनात्मक हैसियत और मजबूत हो सकती है।
अब सचिन पायलट की नई परीक्षा
दूसरी ओर कांग्रेस ने राजस्थान के लोकप्रिय नेता सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का नया प्रभारी बनाया है। पार्टी ने उन्हें भूपेश बघेल की जगह यह जिम्मेदारी दी है। यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब कांग्रेस पंजाब में संगठनात्मक चुनौतियों और अंदरूनी खींचतान से जूझ रही है।
पायलट के सामने कांग्रेस संगठन को एकजुट करने, कार्यकर्ताओं में भरोसा पैदा करने और पार्टी को 2022 के बाद की चुनौतीपूर्ण स्थिति से बाहर निकालने की जिम्मेदारी होगी। पंजाब में कांग्रेस का प्रदर्शन जितना बेहतर होगा, उतना ही पायलट की राष्ट्रीय राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चा तेज हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल—क्या पंजाब का नतीजा राजस्थान का भविष्य लिखेगा?
यहीं से राजस्थान की राजनीति का बड़ा सवाल सामने आता है। क्या पंजाब चुनाव 2027 के बाद भाजपा में सतीश पूनिया और कांग्रेस में सचिन पायलट की राजस्थान में भूमिका तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव बनेगा?
सतीश पूनिया पहले राजस्थान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और प्रदेश की राजनीति में उनका मजबूत संगठनात्मक आधार माना जाता है। दूसरी तरफ सचिन पायलट राजस्थान कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में हैं और मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में उनका नाम लंबे समय से चर्चा में रहा है।
ऐसे में पंजाब का चुनाव दोनों के लिए ‘अगली पारी का रिपोर्ट कार्ड’ बन सकता है। पूनिया के नेतृत्व में भाजपा पंजाब में बड़ा राजनीतिक विस्तार करती है तो भाजपा केंद्रीय नेतृत्व में उनका कद और बढ़ सकता है। वहीं पायलट कांग्रेस को पंजाब में मजबूत प्रदर्शन दिलाने में सफल होते हैं तो राजस्थान सहित राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका और प्रभाव बढ़ने की संभावना पर नए सिरे से चर्चा होगी।
एक चुनाव, दो राजस्थान चेहरे और दोनों की अग्निपरीक्षा
फिलहाल पंजाब की चुनावी जंग में दोनों नेताओं की जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं, लेकिन राजनीतिक महत्व बड़ा है। पंजाब में जीत-हार केवल पंजाब की सरकार तय नहीं करेगी, बल्कि दोनों दलों के भीतर इन राजस्थान मूल के नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता और भविष्य की भूमिका पर भी असर डाल सकती है।













